मीडिया एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की हेडलाइन बनाकर बेच रहा है। मुख्यधारा की खबरों में दावा किया जा रहा है कि ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध को २४ घंटे में रुकवा सकते हैं, लेकिन बात सिर्फ वोलोडिमिर जेलेंस्की और व्लादिमीर पुतिन के अड़ियल रवैये के कारण अटकी हुई है। यह विश्लेषण पूरी तरह से सतही, आलसी और वास्तविक भू-राजनीति से कोसों दूर है। सच तो यह है कि यह युद्ध किसी व्यक्ति के रवैये या अहंकार की वजह से नहीं चल रहा है। यह दशकों पुराने संरचनात्मक सुरक्षा संकट और गहरे आर्थिक हितों का परिणाम है, जिसे कोई एक नेता अपनी टेबल पर बैठकर चुटकी में हल नहीं कर सकता।
ट्रंप का यह दावा कि वे पुतिन और जेलेंस्की को एक कमरे में बंद करके समझौता करा देंगे, सुनने में आकर्षक लग सकता है। लेकिन यह केवल एक चुनावी और राजनीतिक पीआर स्टंट है। इस युद्ध को सिर्फ दो राष्ट्रपतियों की व्यक्तिगत जिद मान लेना इतिहास और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सबसे बड़ी गलतफहमी है।
युद्ध रोकने के झूठे दावों के पीछे का असली गणित
जब कोई राजनेता कहता है कि वह एक जटिल अंतरराष्ट्रीय संघर्ष को तुरंत समाप्त कर देगा, तो वह असल में वैश्विक सुरक्षा के बुनियादी सिद्धांतों को नजरअंदाज कर रहा होता है। मीडिया इस "सस्ते समाधान" के जाल में फंस जाता है क्योंकि जटिलताओं को समझाने के बजाय एक मसीहा की छवि बेचना आसान होता है।
इस संघर्ष के पीछे के तीन मुख्य कारक हैं जिन्हें दबा दिया जाता है:
- नाटो का विस्तार और सुरक्षा दुविधा: रूस इस युद्ध को केवल यूक्रेन के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं पर नाटो के विस्तार के खिलाफ एक अस्तित्व की लड़ाई के रूप में देखता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ जॉन मियरशाइमर ने वर्षों पहले चेतावनी दी थी कि यूक्रेन को पश्चिम का गढ़ बनाने की कोशिश का अंजाम यही होगा। पुतिन का रवैया रातों-रात नहीं बदला जा सकता क्योंकि यह रूस की दीर्घकालिक सैन्य रणनीति का हिस्सा है।
- यूक्रेन की संप्रभुता का सवाल: जेलेंस्की के लिए पीछे हटने का मतलब केवल राजनीतिक आत्महत्या नहीं, बल्कि यूक्रेन के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व को समाप्त करना होगा। १९९४ के बुडापेस्ट मेमोरेन्डम के तहत यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार इस गारंटी पर छोड़े थे कि उसकी सीमाओं का सम्मान किया जाएगा। उस वादे के टूटने के बाद, कोई भी यूक्रेनी नेता बिना ठोस सुरक्षा गारंटी के केवल एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता।
- हथियार उद्योग का आर्थिक हित: इस युद्ध से अमेरिका और यूरोप के सैन्य-औद्योगिक परिसर (Military-Industrial Complex) को अरबों डॉलर का मुनाफा हो रहा है। पुराने हथियारों के भंडार खाली हो रहे हैं और नए अनुबंध किए जा रहे हैं। जब आर्थिक हित इतने गहरे हों, तो केवल वाशिंगटन से आने वाला एक बयान युद्ध को नहीं रोक सकता।
क्या ट्रंप सच में सहायता रोककर यूक्रेन को झुका सकते हैं?
एक आम धारणा यह है कि यदि ट्रंप दोबारा सत्ता में आते हैं और यूक्रेन को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य सहायता को पूरी तरह बंद कर देते हैं, तो जेलेंस्की को आत्मसमर्पण करना ही पड़ेगा। यह सोच भी अधूरी है।
मान लीजिए कि एक परिदृश्य में अमेरिका अपनी पूरी फंडिंग रोक देता है। इसके बाद क्या होगा? यूरोप अकेले इस बोझ को उठाने के लिए मजबूर होगा। यूरोपीय देश जैसे पोलैंड, एस्टोनिया और लिथुआनिया इस युद्ध को अपने अस्तित्व के खतरे के रूप में देखते हैं। वे अपनी सैन्य क्षमताएं बढ़ा रहे हैं। अमेरिकी पीछे हटने से युद्ध समाप्त नहीं होगा, बल्कि यह अधिक अनियंत्रित और हिंसक रूप ले सकता है क्योंकि तब यूक्रेन गुरिल्ला युद्ध और अपरंपरागत सैन्य रणनीतियों का सहारा लेगा।
यूक्रेन को सैन्य मदद रोकने का मतलब रूस को खुली छूट देना होगा, जिसे यूरोपीय संघ कभी भी आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए, फंडिंग का स्विच बंद करने से शांति नहीं आएगी, बल्कि यूरोप में एक नया और अधिक खतरनाक सुरक्षा संकट पैदा हो जाएगा।
पुतिन के लिए समझौते का कोई आसान रास्ता नहीं है
ट्रंप के समर्थकों का मानना है कि पुतिन के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध इस गतिरोध को तोड़ सकते हैं। लेकिन कूटनीति व्यक्तिगत संबंधों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और शक्ति के संतुलन से चलती है। पुतिन ने यूक्रेन के चार क्षेत्रों (डोनेट्स्क, लुहान्स्क, ज़ापोरीझिया और खेरसॉन) को आधिकारिक तौर पर रूसी संघ का हिस्सा घोषित कर दिया है।
रूसी संविधान के अनुसार, इन क्षेत्रों को अब किसी भी समझौते के तहत वापस नहीं किया जा सकता। क्या कोई यह मानता है कि पुतिन रूसी कानून को दरकिनार कर ट्रंप के कहने पर इन क्षेत्रों को छोड़ देंगे? या क्या जेलेंस्की अपनी २५ प्रतिशत भूमि को हमेशा के लिए रूस के हवाले करने वाले समझौते पर हस्ताक्षर करके सत्ता में टिके रह सकते हैं? इन दोनों ही सवालों का जवाब 'ना' है। दोनों पक्षों के राजनीतिक हित इस कदर फंस चुके हैं कि समझौता टेबल पर बैठकर नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में ताकत के संतुलन से ही तय होगा।
शांति वार्ताओं का क्रूर सच और ऐतिहासिक सबक
इतिहास गवाह है कि जब तक दोनों पक्ष पूरी तरह से थक नहीं जाते (Ripeness for Resolution), तब तक कोई भी मध्यस्थता काम नहीं करती। कोरियाई युद्ध का उदाहरण हमारे सामने है, जहां तीन साल की भीषण लड़ाई के बाद भी कोई स्थायी शांति समझौता नहीं हुआ, बल्कि केवल एक युद्धविराम (Armistice) हुआ जो आज भी जारी है। यूक्रेन में भी सबसे संभावित परिणाम एक जमी हुई जंग (Frozen Conflict) है, न कि कोई भव्य शांति समझौता।
मुख्यधारा के विश्लेषक अक्सर पूछते हैं: "पुतिन और जेलेंस्की बातचीत की मेज पर क्यों नहीं आते?"
यह सवाल ही गलत है। सही सवाल यह होना चाहिए: "क्या दोनों पक्षों में से कोई भी इस समय युद्ध के मैदान में अपनी स्थिति को कमजोर मानने के लिए तैयार है?" जब तक दोनों देशों को यह नहीं लगता कि आगे लड़ने से उन्हें सिर्फ नुकसान होगा, तब तक कोई भी बातचीत केवल समय बर्बाद करने का जरिया होगी। ट्रंप का दावा इस कड़वी वास्तविकता को छिपाने का एक लोकलुभावन प्रयास मात्र है।
इस संघर्ष का समाधान किसी एक अमेरिकी राष्ट्रपति के अहंकार या उसकी बातचीत की कला में नहीं छिपा है। यह एक बहुध्रुवीय दुनिया की शुरुआत है जहां महाशक्तियां अपनी सीमाओं को फिर से तय कर रही हैं। जो लोग सोचते हैं कि एक चुनाव पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरण को बदल देगा, वे केवल एक सुखद भ्रम में जी रहे हैं। युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक कि दोनों सेनाएं थक नहीं जातीं या फिर संसाधनों का पूरी तरह से अकाल नहीं पड़ जाता। तब तक, वाशिंगटन से आने वाले हर शांति के दावे को केवल एक राजनीतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं समझा जाना चाहिए।